Bhakt Prahlaad - 1 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 1

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भक्त प्रह्लाद - 1

श्रीहरि का नरसिंह अवतार

पौराणिक कथाओं में विष्णुभक्त प्रह्लाद की कथा का अत्यंत महत्त्व है। यह कथा अन्याय, अत्याचार एवं अभिमान पर न्याय, सदाचार और स्वाभिमान की जीत की शिक्षा देती है। यह कथा उस समय की है, जब संपूर्ण सृष्टि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे असुरों के आंतक से त्रस्त थी। चारों ओर आसुरी शक्तियों की प्रबलता थी। धर्म, कर्म और वेद, यज्ञ आदि की प्रतिष्ठा लगभग निष्प्राण हो चुकी थी। ऐसे विपरीत और गहन धार्मिक संकटकाल में भी प्रह्लाद जैसे भक्त की पावन भक्ति ने श्रीहरि को नृसिंह अवतार धारण करने हेतु प्रेरित किया। भक्त प्रह्लाद की कथा का आरंभ अपने पिता हिरण्यकशिपु के ज्येष्ठ भ्राता असुरराज हिरण्याक्ष के उत्थान एवं पतन से होता है। हिरण्याक्ष को जब यह विश्वास हो चला कि उसमें अब इतनी सामर्थ्य आ गई है कि वह देवताओं को पराजित कर सकता है, तो उसने असुर सेना के साथ देवलोक पर आक्रमण कर दिया। देवताओं की सेना हिरण्याक्ष से पराजित हो गई। इस विजय से हिरण्याक्ष अत्यंत अभिमानी हो गया। वह विचार करने लगा कि अब सृष्टि में उसे पराजित करने वाला कोई शेष नहीं है, किंतु उसने सोचा कि देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष में निर्णायक मोड़ पर बार-बार अवरोध उत्पन्न करने वाले भगवान् श्रीहरि विष्णु को पराजित करने के पश्चात् ही वह निष्कंटक राज कर सकता है। यह विचार कर वह भगवान् विष्णु से युद्ध करने हेतु उनकी खोज में जुट गया। हिरण्याक्ष ने काफी समय तक सृष्टि में भगवान् विष्णु की बहुत खोज की, किंतु उसे कुछ भी आभास तक न मिल सका। अंततः क्रुद्ध होकर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया, तब अपने भक्तों की करुण पुकार पर श्रीहरि ने वराह का रूप धारण कर पृथ्वी को समुद्र से निकाल लिया और यथास्थान स्थापित कर दिया। यह देखकर हिरण्याक्ष भगवान् विष्णु रूपी वराह को घोर अपशब्द कहने लगा, तब क्रोधित होकर भगवान् वराह ने हिरण्याक्ष के ऊपर छलाँग लगा दी, दोनों के बीच लंबे समय तक द्वंद्वयुद्ध चला। अततः भगवान् वराह ने हिरण्याक्ष का संहार कर दिया।

जब हिरण्यकशिपु को सूचना मिली कि उसका शक्तिशाली ज्येष्ठ भ्राता हिरण्याक्ष भगवान् विष्णु के द्वारा मार दिया गया तो वह विष्णु-वैरी बन बैठा। उसने भगवान् विष्णु और सृष्टि के अन्य देव-दानव, यक्ष-गंधर्व आदि सभी से अपराजेय रहने के लिए परमपिता ब्रह्माजी से अजेय और अपरिमित शक्ति का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके पश्चात् उसने भगवान् विष्णु के मानने वाले भक्तों, साधु, संतों एवं मुनियों पर तरह-तरह के अत्याचार करने आरंभ कर दिए। इसका परिणाम यह हुआ कि देवताओं को यज्ञकर्म आदि का फल न प्राप्त होने के कारण उनकी शक्तियाँ क्षीण होने लगीं। इस स्थिति को हिरण्यकशिपु ने अपने लिए उचित अवसर के रूप में लिया। उसने दुर्बल होते देवताओं पर अचानक शक्तिशाली आक्रमण किया और उन्हें पराजित कर देवलोक से पलायन करने के लिए विवश कर दिया। शीघ्र ही वह अपनी अपरिमित शक्ति के कारण त्रैलोक्य का अधिपति बन बैठा। 

विधि की एक निराली विडंबना देखिए! हिरण्यकशिपु जिस भगवान् विष्णु से परम शत्रुता रखता था और जिनका नाम भर लेने वालों को वह प्राणदंड देने में क्षण-भर का भी समय नहीं लेता था, उसी के यहाँ परम विष्णुभक्त प्रह्लादजी का जन्म हुआ। इससे पूर्व उसकी तीन संतानें और थीं, किंतु वह प्रह्लाद को अधिक प्रेम करता था। वह प्रह्लाद को इतना प्रेम करता था कि उससे दूर रहना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता था।

समय बीता। प्रह्लाद अब कुछ बड़ा हुआ तो वह भगवान् विष्णु की भक्ति में अपना मन रमाने लगा। कोई भी प्रहर, कोई भी घड़ी वह केवल भगवान् विष्णु का नाम स्मरण ही करता रहता था। हिरण्यकशिपु के लिए यह चिंता का विषय बन गया था। उसने लाख प्रयास किए कि वह उसके परम शत्रु की स्तुति करना बंद कर दे, किंतु प्रह्लाद ने ऐसा नहीं किया। अंतत: हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद पर तरह-तरह के अत्याचार करने आरंभ कर दिए। — हिरण्यकशिपु का विचार था कि उसके अत्याचारों से तंग आकर प्रह्लाद विष्णु की स्तुति करना बंद कर देगा, किंतु प्रह्लाद टस से मस न हुआ। वह अपने भक्ति-पथ पर अडिग रहा। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद पर तलवार-भालों से वार कराए तो उसका शरीर वज्र बन गया, तीक्ष्ण विष युक्त लड्डुओं का सेवन कराया तो विषयुक्त लड्डू अमृतमय बन गए, पर्वत शिखर से नीचे गिराया तो शिखर स्वयं नमन की मुद्रा में झुक गया और उसे एक खरोंच तक न आई। ऐसे ही उसने प्रह्लाद पर न जाने कैसे-कैसे अत्याचार किए, किंतु वह अपने मनोरथ में जरा भी सफल न हुआ ।

अंततः जब हिरण्यकशिपु के अत्याचारों एवं पापों का घड़ा भर गया तो भगवान् विष्णु ने नरसिंह का अवतार लेकर अत्याचारी हिरण्यकशिपु का अंत कर दिया। प्रस्तुत लेख ‘भक्त प्रह्लाद’ में विष्णुभक्त प्रह्लाद की कथा को बहुत ही सरल, सहज एवं रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि यह पाठकों को बहुत पसंद आएगी।